
निगाहें...
नयनों के कमान से
निगाहें निकलती हैं तीर सी
दिल को घायल किया
जिसका नहीं है कोई ‘मरहम’
काश! अब गये ‘मर हम’।
कभी कभी बिना कुछ कहें
दिल की बात कहती हैं
दु:ख में ही नहीं…
खुशी में भी ऑंसू बहाती हैं
ग़म हो या आनंद
सब कुछ सहती हैं - आंखें
नयनों की, कोई ज़बान नहीं होती
बस! मौन की भाषा ही जानती,
दिल की दास्ता
आंसूओं के रूप में बहाती………
‘दिल की लगी’ को
‘दिल्लगी’ बनाती
और ‘दिलरूबा’ कहलाती
काश! दिल जलाती!
हम को बेचैन करती
वे चैन से,
आनंद से
आराम से
गीत-गाती
लोरियां सुनती
सो जाती!